स्ट्रोक के लगभग 70 फीसदी मामलों का या तो इलाज हो सकता है या इन्हें रोका जा सकता है : डॉ. विपुल गुप्ता


गुरुग्राम: एक आकलन है कि दुनिया में स्ट्रोक से हर 40 मिनट पर एक व्यक्ति पीडि़त होता है और हर चार मिनट पर एक व्यक्ति की स्ट्रोक से मौत हो जाती है। 25 फीसदी आबादी जीवन के किसी न किसी मोड़ पर स्ट्रोक अटैक से पीडि़त होती है जबकि स्ट्रोक के 7080 फीसदी मामले हाइपरटेंशन, डायबिटीज, कोलेस्ट्रोल लेवल का ख्याल रखने से रोके जा सकते हैं। इसके अलावा जीवनशैली में बदलाव, उचित खानपान, पर्याप्त व्यायाम, वजन पर नियंत्रण रखने तथा धूम्रपान त्यागने से स्ट्रोक को रोका जा सकता है। स्ट्रोक रोकने का एक सबसे अच्छा तरीका शारीरिक श्रम करते रहना भी है। ब्रेन स्ट्रोक मृत्यु का दूसरा बड़ा और दीर्घकालीन अपंगता का प्रमुख कारण माना जाता है। सही समय पर इलाज करने से नुकसान को कम किया जा सकता है, वहीं लोगों के लिए यह जानना भी जरूरी है कि मरीज के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर तत्काल उसे अस्पताल ले जाया जाए। जागरूकता सत्र का आयोजन आर्टेमिस एग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज में न्यूरोइंटरवेंशन के प्रमुख और स्ट्रोक यूनिट के सह निदेशक डॉ.विपुल गुप्ता तथा स्ट्रोक न्यूरोलॉजी एंड न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी के डॉ.राजश्रीनिवास पार्थसारथी ने किया। स्ट्रोक के इलाज के क्षेत्र में आई तरक्की से स्ट्रोक के बाद विंडो पीरियड (निर्धारित अनुकूल अवधि) में डॉक्टर के पास आने से मरीज का न सिर्फ  बेहतर इलाज हो सकता है, बल्कि ज्यादातर मामलों में मरीजों को सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है। सच्चाई यह है कि स्ट्रोक के लगभग 70 फीसदी मामलों का या तो इलाज हो सकता है या इन्हें रोका जा सकता है। इस सच्चाई को जानते हुए आर्टेमिस एग्रिम इंस्टीट्यूट न्यूरोसाइंस, गुरुग्राम ने आज जन जागरूकता सम्मेलन के जरिये लोगों में जागरूकता बढ़ाने के महत्व पर जोर दिया। डॉ.विपुल गुप्ता ने कहा, जब स्ट्रोक की बात आती है, तो इसमें प्रत्येक मिनट मायने रखता है। समय ही महत्वपूर्ण है’ और मरीजों के लिए यह सबसे जरूरी है कि स्ट्रोक को शुरू में ही पहचान लें, जिसमें इसके लक्षणों के बारे में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। प्रत्येक मिनट में 20 लाख कोशिकाओं की क्षति होती है। लिहाजा स्ट्रोक के दौरान मरीज के लिए हर गुजरता मिनट महत्वपूर्ण होता है। इन दिनों स्ट्रोक के इलाज की कई आधुनिक पद्धतियां हैं जिनमें शुरुआती स्तर के इलाज से स्ट्रोक रोका जा सकता है और मरीज को सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है। हालांकि प्रभावी इलाज के लिए स्ट्रोक के बाद पहले गोल्डन आवर्स में इलाज काफी प्रभावी होता है। स्ट्रोक के इलाज के क्षेत्र में न्यूरोइंटरवेंशनल थ्रोम्बेक्टोमी सर्जरी जैसी तरक्की के कारण स्ट्रोक के बाद विंडो पीरियड में लाए जाने वाले मरीज का न सिर्फ  बेहतर इलाज हो सकता है, बल्कि ज्यादातर मामलों में मरीज को सामान्य स्थिति में भी लाया जा सकता है। न्यूनतम शल्यक्रिया होने के कारण स्ट्रोक थ्रोम्बेटोमी आपातकालीन इलाज का पहला स्थापित विकल्प है और अत्यंत प्रभावी तथा सुरक्षित है। इसके जरिये इलाज में कैथेटर आधारित डिवाइस के जरिये अवरुद्ध आर्टरी को खोलते हुए मस्तिष्क में रक्तप्रवाह बहाल किया जाता है।’

डॉ. राजश्रीनिवास पार्थसारथी ने कहा, एक्यूट स्ट्रोक का सार्थक इलाज सही समय पर इलाज शुरू कराने पर निर्भर करता है और इस प्रकार मरीजों को शुरुआती चरण में ही अस्पताल पहुंचाना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यानी लोगों में स्ट्रोक की शुरुआती पहचान और जागरूकता ही सबसे महत्वपूर्ण है। स्ट्रोक यूनिट तक मरीज को गोल्डन विंडो पीरियड में पहुंचाने के लिए स्ट्रोक अटैक के छह घंटे के अंदर की अवधि महत्वपूर्ण होती है, इसमें जरा भी देरी होने पर मरीज को होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो पाती है और ऐसे 80 फीसदी मामलों में स्थायी अपंगता आ जाती है।’ स्ट्रोक का इलाज संभव है’ का संदेश विश्व स्ट्रोक दिवस को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है। शुरुआती चरण में इसकी पहचान से इलाज में बड़ा बदलाव आता है और इससे आपातकालीन इलाज के दौरान अविश्वसनीय परिणाम मिलता है। हम लोगों को स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने और इस बारे में जानने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। फास्ट (फेस ड्रॉपिंग, आर्म विकनेस, स्पीच स्लर्ड, टाइम टु कॉल एंबुलेंस) जान लें यानी इस दौरान चेहरा लटकने, बांहों में कमजोरी, बोली में लडख़ड़ाहट, एंबुलेंस तत्काल बुलाना बहुत जरूरी है।  लोगों को जान लेना चाहिए कि सक्रिय जीवनशैली के कई सारे स्वास्थ्य फायदे हैं और इनमें स्ट्रोक पर रोक लगाने जैसे फायदे भी हैं। ज्यादा समय तक स्क्रीन पर समय बिताने से बचना या तनाव दूर करना भी आधुनिक युग के लिए महत्वपूर्ण है।

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